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तोतिया तीतर: पुस्तक समीक्षा
About the book being reviewed
Poems by Prabhat · Illustrations by Proiti Roy · Eklavya. Review by Anil Singh.


अभी हाल ही में, मई 2024 में प्रभात का नया कविता संग्रह आया है जिसे एकलव्य ने प्रकाशित किया है। यह कई मायनों में अपने पिछले संग्रहों से बिल्कुल अलग और अनूठा है। अव्वल तो यह छोटी छोटी कविताओं का संग्रह है, छोटी मतलब हर कविता महज चार लाइनों की ही है। और दूसरा यह कि चार लाइनों में ही कमाल का दृश्य, विचार, भाव तीव्रता और भाषा का संसार रच देने में माहिर रहे हैं प्रभात। प्रभात की कविताओं में मामूली विषयों की उच्चतम और नायाब अभिव्यक्ति मिलने की पूरी संभावना रहती है।
अवलोकन के मामले में प्रभात का जवाब नहीं। जिन पर किन्हीं की नज़र नहीं है उनपर प्रभात की नज़र है। पंछी नाम से संग्रह की पहली कविता ही प्रभात की बारीक और व्यापक नज़र का परिचय देती है-
रेशों से घर सिल लेते हैं,
तिनकों से घर बुन लेते हैं
पंछी बरगद के पत्तों पर
पैदल पैदल चल लेते हैं।
इस सुविधाभोगी दुनिया और दौड़भाग के साथ तकनीक से लबरेज जीवन में प्रभात को बरगद के पत्तों पर पंछियों का पैदल पैदल चलना दिख जाता है। वो ठहरकर इत्मीनान से उन्हें देखते हैं और देखते ही रहते हैं। और वो न सिर्फ इसे देखते हैं बल्कि पूरी गरिमा के साथ उसका बयान करते हैं। पत्तों पर पंछियों के पैदल पैदल चलने में जितनी सादगी है उतनी ही भव्यता।
एक और कविता में मुर्गी डाँट रही है मुर्गे को कि तमीज़ से छींकों। यह समीकरण पहले कभी न देखा गया न सुना गया है। लेकिन प्रभात की नज़र यह भाँप लेती है कि मुर्गे और मुर्गी के बीच क्या चल रहा है। छोटा सीटू सो रहा है और उसके जाग जाने को लेकर मुर्गी कन्सर्न्ड है। मुर्गे को समझाने का और कोई तरीका नहीं।
संग्रह में प्रोइती रॉय के चित्र बेमिशाल हैं। ‘मुर्गे की छींक’ वाली कविता के साथ जो चित्र है उसे कविता पढ़ते हुए अगर थोड़ा ठहरकर देखें, तो उसमें मुर्गी का डाँटना जैसे सुनाई पड़ सकता है। मुर्गे के शरीर की लोच, मुर्गे के नजदीक आकर मुर्गी का यह हिदायत देना, झुककर धीरे से बोलना कि छोटा सीटू सो रहा है, आँखों में गुस्सा और शिकायत उस चित्र में साफ झलकती है। इसके साथ ही मुर्गे का लाचार होकर छींकना और यह स्वीकारना कि ‘वह क्या करे छींक रुक ही नहीं रही’, भी आप महसूस कर सकते हैं। छींकते समय शरीर का आगे की तरफ झुकना, आँख बंद हो जाना सबकुछ बारीकी से चित्र में आए हैं।
भाषा से खेलने में भी प्रभात पीछे नहीं हैं। एक कविता में वो ‘बयाएं’ और ‘दुनियाएं’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जो आमतौर पर मिलते नहीं, पर प्रभात इन्हें गढ़ते हैं। एक जगह उन्होंने झिंगुर के साथ उसकी पार्टनर के लिए ‘झिंगुरानी’ शब्द का इस्तेमाल किया है जोकि यूँही अच्छा लगता है। कविता में तो यह और भी सुन्दर लगा है। एक और कविता में टिंडा के साथ भटिंडा और भिंडी के साथ रावलपिंडी का जोड़ इतना खूबसूरत लगता है फिर अगली पंक्ति फीकी लगने लगती है।
‘सांप ने कुकुरमुत्ते की छतरी तान ली अपनी समझ के’ कविता में ‘अपनी समझ के’ का जो भाव है वह बिरला है। इसमें एक सहचर्य है, आपसदारी है जो प्रकृति में ही ज्यादा देखने को मिलती है। सांप की मासूमियत और छतरी का अबोला ही इस कविता की जान है।
चींटा चींटी , पाकर चीनी
खेल रहे थे, छीना छीनी
जैसी सुन्दर बात प्रभात ही कर सकते हैं। छोटी छोटी पंक्तियों में पूरा दृश्य, पूरा मजा, पूरी भाषा। छीना छीनी कहकर उन्होंने छीना झपटी से बचा लिया है इसे। इसमें खेल है, प्यार है और नोक झोंक है। झगड़ा नहीं है। छीना शब्द चींटा के लिए और छीनी शब्द चींटी के लिए सुरक्षित कर दिया है।
इसके साथ बने चित्र में चींटा और चींटी जिस तरह छीना छीनी खेल रहे हैं उसमें खेल, ताकत, खिंचाव और अधिकार सबकुछ साफ दिखता है। चींटा चींटी जैसे फिगर में ये सब अभिव्यक्तियाँ डाल पाना कोई आसान काम नहीं। प्रोइती जैसे चित्रकार ही ऐसा कर पाते हैं।
रिक्शेवाला कविता में प्रभात कहते हैं -
‘स्टेशन से घर गलियों तक,
सफर सभी का हो गया’,
लेकिन रिक्शेवाले का सफर अभी बाकी है, उसका घर जाने कहाँ है। सभी को उनके गंतव्य तक पहुंचाकर -
‘देर रात को रिक्शेवाला,
रिक्शे पर ही सो गया’।
‘रिक्शेवाला’ कविता के लिए प्रोइती रॉय का बनाया, रिक्शे पर सोता हुआ रिक्शेवाला इतना जीवंत है कि उसके चेहरे पर थकान, मासूमियत, लाचारी और संतोष के मिले जुले लेकिन स्पष्ट भाव दिखते हैं। इतने से चेहरे पर महज चंद रेखाओं से इतना सजीव चित्रण अनूठे ही मिलते हैं।
अपने ही रिक्शे में परायों की तरह आधा लटका, थक कर गहरी नींद मे सोया, 50 -55 की उम्र का मेहनतकश एक व्यक्ति पूरे सामाजिक ताने बाने का प्रतिनिधि जान पड़ता है।
शाम की तितली कविता में प्रभात की कल्पना की बानगी देखिए - शाम ढलते ही उजाले की तितली उड़कर चली गई और अब घर, जंगल, मैदान, गली सब अँधियारे में डूब गए हैं। उजाले को तितली कहने पर उसका हलकापन, उजलापन और थोड़ी देर कहीं ठहरकर फिर उड़ जाने की फितरत का अच्छा बिम्ब कविता में बनता है। अंधरे की नदी जैसे अपनी पूर पर है और घर, जंगल, मैदान, गली उसमें डूब गए हैं।
रेल और व्हेल कविता में एक बिल्कुल नई बात देखने को मिलती है।
‘रेल चली भई रेल चली,
नभ में कुरजों की रेल चली
समंदरों में व्हेल चली,
व्हेल चली भई व्हेल चली’।
यह जो ‘नभ में कुरजों की बेल’ है यह बिल्कुल नया प्रयोग है। बगुलों की कतारें, पंक्तियाँ, झुंड, पंछियों के बादल तो हमने सुने और पढ़ें हैं। पर यह कुरजों की बेल प्रभात का कमाल है। रेल, बेल और व्हेल का कॉम्बिनेशन भी यूनिक है।
एक ही दृश्य में रेल का चलना, नभ में कुरजों की बेल का चलना और समन्दर में व्हेल का चलना , कहीं दूर से इन तीनों को देखते हुए एक ही फ्रेम मे लेना चित्रकार की कल्पना शक्ति और उसके अवलोकन की गहराई बताता है।
‘मूँछों की छड़ी’ कविता में मूँछ का लोगों से टकराने वाला विजुअल बड़ा ही मजेदार है।
‘आफत की सी छड़ी हो गई
मूँछ इतनी बड़ी हो गई’।
प्रभात इन लंबी और बड़ी बड़ी मूँछों वालों के साथ उठने बैठने वाले व्यक्ति हैं, इसलिए उनकी कहन में एक प्रामाणिकता है।
संग्रह की शीर्षक कविता ‘तोतिया तीतर’ में प्रभात दरअसल एक खोजी और संशय में देखने वाले की तरह से लिखते हैं और अपना कौतूहल जताते हैं - घास की तरह दिखने वाला हरा टिड्डा ऐसे चल रहा है जैसे हरे रंग का तीतर घास के भीतर चल रहा हो -
‘घास को चलते कभी न देखा
वह टिड्डा था घास सरीखा
चलता था जो घास के भीतर
जैसे कोई तोतिया तीतर’।
यह कविता संग्रह हमारे इरगिर्द के मामूली लेकिन अहम और खूबसूरत किरदारों का कोलाज है। इसमें भाषा का रोचक संसार है। बारीकी से देखना है और मासूमियत से कहना है। न कोई गूढ़ता है न लफ़्फ़ाज़ी। प्रभात को यह आता ही नहीं। इसलिए, कहा जाता भी नहीं।