A SHORT STORY

ऊकू बूदू: बिना नाम वाली एक लड़की

जमीन पर खड़ा दो मुँहा शहतीर, जिस पर छप्पर की ठाठ टिकी रहती है, हमारे यहाँ उसे थुनिया कहते हैं। दीवार के कोने से उस थुनिया के बीच कोई पांच छः इंच का फासला रहा होगा।

वह अपने घर से निकलती और सड़क पार कर मेरे घर के बाहर उस कोने में खड़ी हो जाती। दीवार और थुनिया के बीच अपना बड़ा सा सिर टिकाये वह देर दोपहर तक नीम के नीचे बच्चों को खेलता देखती रहती।

कभी अपने उलझे और मटमैले बालों को दोनों हाथों से खुजलाती और कभी अपनी बड़ी सी फ्रॉक की ढीली बांहों से नाक में बैठी मक्खियों को हटाती। यह बड़ी फ्रॉक उसकी बड़ी बहन की थी। स्कूल जाने वाली उसकी बड़ी बहन मेरी हमउम्र थी। उसकी छोड़ी गयी फ्रॉक इसे झंगा झोली की तरह होती। सोचता हूँ क्या उसके कपड़ों का कोई नाप न रहा होगा जैसे सबके कपड़ों का होता है। बेबी, स्माल, मीडियम या लॉन्ग। तो क्या उसका माप एक्स्ट्रा लार्ज ही था जो हर कपड़ा उसे झंगा झोली ही होता था...

मुझे जब उसका चेहरा याद आता है तो ध्यान आता है कि उसकी एक आँख भी कम खुलती थी। वह कुछ न बोलती, पर बच्चों को खेलता देख कई बार मैंने उसे अपने में ही मुस्कराते देखा था। शायद उसे बच्चों को खेलता देखना अच्छा लगता रहा होगा। तभी तो वह घर से निकल कर धीरे धीरे चलती मेरे घर के कोने में उस दीवार और थुनिया के बीच सिर टिकाकर खड़ी रहती थी। वह जगह उसकी थी, बिल्कुल निरापद। वहां उसे कोई रोकता टोकता न था, कोई संवाद की संभावना न थी; न कोई जोख़िम, न कोई अपेक्षा। वह बस खड़ी रहती। ज्यादा कुछ पूछने पर ‘ऊकू बूदू बोलती’। यह ऊकू बूदू ही उसका नाम और पहचान बन गया था।

इतने सालों बाद जब याद करता हूँ तो सोचता हूँ कि क्या सचमुच उसका कोई और नाम न रहा होगा, जैसे सबके होते हैं ? क्या एक खास तरह की बच्ची होने के कारण उसका कोई सामान्य सा नाम न रहा और वह मुझे ऊकू बूदू नाम से ही आज तक याद है।

सर्दियों के दिन थे। नीम के नीचे बच्चे चिरंगा खेल रहे थे। कुछ घास के टीले में बैठे गपिया रहे थे। किसी का ध्यान उसकी तरफ गया ही नहीं। जैसे वह किसी के लिए भी न होने की तरह थी। जाने कब दीवार और थुनिया के बीच उसका सिर फँस गया था। वह ऐसे ही न जाने कितनी देर से अपने फँसे हुए सिर के साथ खड़ी रही होगी। खेलते हुए किसी बच्चे की ही नज़र गई और उसने चिल्लाना शुरू किया। तब कहीं जाकर घर और आस पड़ोस के लोग दौड़े आये। बमुश्किल उसका सिर निकला था। पर वह चूं से चां न बोली।

कोई ११ साल का रहा होऊंगा मैं, और वह कोई ७-८ या ९-१० साल की। बड़े होकर भी स्कूल न जाने वाले बच्चों की उमर का अंदाज़ा लगाना आसान न था मेरे लिए। अगर वह स्कूल जाती होती तो आसानी से मैं उसकी कक्षा में ५ साल जोड़के उसकी ठीक ठीक उमर जान पाता। कद काठी से अंदाज़ लगाना भी कठिन था।

उसका घर मेरे घर के ठीक सामने था। एक रोज सुबह उसके घर के सामने मोहल्ले के कुछ लोग जमा थे। मैं खिड़की से सब देख रहा था। थोड़ी ही देर में एक सफ़ेद चादर में लपेटे उसे कंधे पर उठा कर ले गये। मुझे अच्छी तरह याद है कहीं से किसी के रोने की कोई आवाज़ नहीं आई थी उस रोज।

बाद में लोगों को कहते सुना – अच्छा हुआ उसे मुक्ति मिली। कोई कहता इतनी ही उमर थी उसकी। कोई भगवान के बुलावे की दुहाई दे रहा था। जल्दी ही सबकुछ सामान्य हो गया। बच्चे फिर हर रोज की तरह नीम के नीचे चिरंगा खेलने में जुट गये।

मेरे घर के कोने में उस थुनिया और दीवार के बीच अब वो उलझे मटमैले बालों वाली, बड़ी सी झंगा झोली फ्रॉक पहने ऊकू बूदू फिर कभी नहीं दिखी।