A SHORT STORY

लालपुर का जंगल और जूली के बच्चे

पड़ोस वाले दिलीप चाचा को जानवर पालने का बहुत शौक था। कॉलेज के दिनों में उन्होने मुर्गी के चूज़े पाल रखे थे। पानवाली एक बड़ी टोकरी में कपड़ा और भूसा बिछाकर उन्होने 12 चूजे रखे थे। ऊपर से एक बड़े टेबल लैम्प से गर्माहट की व्यवस्था की थी। 500 वाट के बल्ब की उस सफ़ेद झकास रोशनी में पीले सफ़ेद रुई के फ़ाहे से चूज़े बहुत ही खूबसूरत लगते थे।

हम 9-10 साल के थे। चूज़े देखने के चक्कर में हम उनके कोने वाले कमरे के आसपास ही मँडराते रहते। बिल्ली का खतरा बना रहता इसलिए दिलीप चाचा बहुत सावधान रहते थे। दरवाजा खुला न रह जाए इसलिए हमें बारबार चूज़े देखने जाने के लिए मना करते थे। कई बार डपट कर भगा भी देते थे। बड़े होने पर मुर्गे मुर्गियाँ राशिद चच्चा के यहाँ भिजवा देते थे। दिलीप चाचा को सिर्फ चूजों का शौक था। एक दफे तो दो खरगोश ले आए थे। एक दड़बा भी बनाया था लकड़ियों का। पर जब बिल्ली ने एक को दबोच लिया और जोड़ी टूट गई तो कई रोज तक उदास रहने के बाद दिलीप चाचा अकेले बचे खरगोश को नर्सरी वाले एक दोस्त को दे आए। पर ऐसा कभी न होता कि वे कोई जानवर न पालते।

एक बार महीने भर की एक देसी कुतिया ले आए। नाम रखा नूरी। उन दिनो फ़ारूख शेख और पूनम ढिल्लन की फिल्म नूरी हिट थी और उमरिया की शिव टाकीज़ में अभी हाल ही में लग भी चुकी थी।

नूरी सीधी सादी, लाल बादामी रंग की देसी कुतिया थी। पर दिलीप चाचा उसे डबलरोटी ही खिलाते थे। चैन से बांधकर रखते और सुबह शाम बाहर निकालकर घुमाते। बाहर खोल देते और नूरी ज़्यादातर छोटे बच्चों के साथ धमा चौकड़ी का खेल खेलती। दिलीप चाचा शुरू शुरू में तो निगरानी करते रहे पर जब मुहल्ले के बच्चों और बड़ों के साथ नूरी की दोस्ती सामान्य हो गई तो वे उसे बाहर छोडकर अंदर अपना काम करते।

पर ऐसे ही किसी रोज सड़क से गुजरते नगर पालिका के ट्रैक्टर ट्रॉली के पहिये के नीचे उसकी टांग आ गई। नूरी बेतहासा चीखी और साढ़े तीन टांग की रह गई। मरहम पट्टी हुई। देसी नुस्खे भी चले। कई रातें नूरी दर्द से कराहती रही। फिर एक रात खामोश हो गई।

सुबह दिलीप चाचा एक पुरानी तौलिया में लपेटकर उसे ले गए। कचेरों के मुहल्ले के आगे नदी किनारे एक खुली जगह में गड्ढा खोदकर उसे प्यार से सुला दिया। फिर कई रोज दिलीप चाचा गुमसुम रहे। पता चला इन दिनों खाना भी ठीक से न खाया था।

लेकिन महीने दो महीने भी बिना कोई जानवर पाले वो रह न सकते थे। जल्दी ही एक और कुतिया ले आए। लूसी, तामियाँ भूरे रंग की, अलसेशियन नस्ल की थी। कोलियरी के किसी एरिया मैनेजर ने ट्रांसफर के वक्त उसे महीने भर की उम्र में दे दिया था।

लूसी थोड़ी आक्रामक थी। अजनबियों के लिए उसकी मंजी भूरी आँखों में हमलावर तेवर देखे जा सकते थे। बच्चे बड़े सभी डरकर रहते उससे। लूसी को चाचा अपनी देखरेख में ही खुला छोड़ते। वह कई लोगों पर झपट चुकी थी। हालांकि चाचा कुतियों को एन्टी रेबीज लगवा कर रखते थे। फिर भी झपटने, नोचने और काट खाने का खौफ तो था ही। कुत्ते से सावधान का बोर्ड भी दरवाजे पर लगाया था चाचा ने। आँगन में ही अमरूद और आड़ू फले थे। पर किसी की हिम्मत न थी यूं ही घर में घुस जाने की।

हमारे घर लगे हुये थे। मैं घर के पिछवाड़े वाले दरवाजे से निकलकर उनके पाखाने से लगे बगीचे से होकर आँगन में पहुँच जाता था। दिलीप चाचा की कबाड़ से जुगाड़ में मास्टरी थी। उनका टूल बॉक्स भी बड़ा अनूठा था। जब भी वो अपना टूल बॉक्स निकालकर कुछ ठोंक पीट का काम करते, मैं सूँघता हुआ उनके पास पहुँच जाता था। बड़े चाचा कोलियरी के लैम्प रूम में बैटरीज़ की मरम्मत का काम करते थे। कई बार खराब बैटरीज़ उठा लाते थे। दिलीप चाचा उन बैटरीज़ से शीशे (लेड) की जालियाँ निकालकर साफ करके रख लेते थे। मैंने देखा एक रोज़ शीशे की उन जालियों को सिल्वर के एक पुराने कटोरे में रखकर सिगड़ी पर गरम कर रहे थे। शीशे की जालियों को सिल्वर के उस बर्तन में पिघलते हुये देखना बहुत ही अनोखा अनुभव था। चाँदी की तरह झिलमिल और चमकदार।

नहानी के पास वाली पक्की फ़रश पर पेचकस की मदद से उन्होने पेंसिल की मोटाई जितनी नाली बना रखी थी। सँड़सी की मदद से बर्तन को उठाकर पिघला हुआ शीशा उस नाली में एक तरफ से डाला। धुआँ उड़ाता शीशा पूरी नाली की लंबाई में फैल गया। थोड़ी ही देर में शीशा जब नाली में जम गया तो उन्होने उस पर एक मग पानी डाल दिया। देखते ही देखते उन्होने एक तरफ से पकड़कर शीशे का वह तार उठा लिया। अब यह पेंसिल की मोटाई का शीशे का एक लंबा तार था। चाचा के पास एक पुरानी एयरगन थी। वे कभी कभी बंदरों को धमकाने के लिए एयरगन चलाते थे। उस एयरगन के छर्रे उमरिया में तो क्या आसपास भी कहीं मिलते न थे। एक दफे जबलपुर से एक पैकेट ले आए थे। पर बचा बचाकर खर्च करने पर भी बमुश्किल साल भर चल पाये। दिलीप चाचा ने उसका तोड़ यही निकाला था कि शीशे के छर्रे उन्होने खुद ही गढ़ने की युक्ति निकाल ली।

छर्रे की साइज़ में शीशे का तार काटने के लिए प्लास खोजते हुये उन्होने मेरी ओर देखते हुये कहा “जूता वाले रैक के ऊपर पॉलिश की डिब्बी के बगल में प्लास रखा है, उठा ला।“

मैं भी बड़े उत्साह में था। अंतिम उत्पाद सामने आने को था। पलक झपकते मैं अंदर की ओर लपका। लूसी वहीं दरवाजे के पास बैठी थी। अचानक इस तरह मेरे घुसने को उसने सहजता से नहीं लिया। वह खड़ी हो गई। मेरी ओर घूरते हुये वह अजीब अंदाज़ में गुर्राई और बिजली की सी फुर्ती के साथ मेरी तरफ झपटी। मैं निक्कर और बुस्शर्ट में था। उसने जांघ को निशाना बनाया। मैं चिल्लाया, वह गुर्राई। तब तक हमला हो चुका था। चाचा माजरे को भाँपते हुये अंदर की तरफ दौड़े। लूसी लूसी कहते हुये उसे गरदन से पकड़ लिया। चैन बांधी और फिर मुझे संभाला। मैं काँप रहा था और रोता जा रहा था। निक्कर सामने की तरफ से फटकर उसकी चिन्दी लटक गई थी। अंदरूनी हिस्से में भी कुछ खँरोचें आई थी। चाचा ने डेटॉल का फ़ोहा बनाकर सफाई की और मेरा हाथ पकड़कर मेरे दरवाजे तक छोड़ गए।

कई रोज तक मैं उनके घर नहीं गया। बाद में मैंने प्लास्टिक के मग में रखे हुये शीशे के छर्रे देखे जो मैं उस रोज न देख पाया था।

अगस्त के महीने में पंखियारी की तादाद बढ़ जाने पर छिपकलियों के मजे हो जाते हैं। दीवार से नीचे आकार वे फटाफट शिकार चट करती हैं। पता चला एक शाम लूसी ने दीवार पर झपट्टा मार एक छिपकली दबा ली। रात भर उल्टियाँ करती रही। सुबह वेटनरी हॉस्पिटल वाले कंपाउंडर शुक्ला जी घर आए। वैसे तो वे गाय भैंस के जानकार थे, पर जानवरों के बारे में जानकारी तो थी ही। कुछ गोलियां पानी में घोलकर लूसी को पिलाई गईं। दोपहर तक लूसी सुस्त होकर निढाल पड़ी रही और फिर देर शाम उसने आँखें मूँद ली।

दिलीप चाचा के जीवन में यह दूसरा बड़ा सदमा था। साहित्य के विद्यार्थी थे, कवितायें लिखते रहे। चैन फेंक दी, लूसी का कटोरा भी फेंक दिया। खाना फिर छूटा। कुछ दिन अनमने रहे। फिर गाय की सेवा शुरू कर दी। सुबह शाम उसे खरहरा करते, बांधते छोड़ते। पानी का पाइप लगाकर नहलाते। गोबर फेंकते और बाड़ा साफ करते।

तीन महीने भी न हुये थे। बारिश खत्म हो गई थी। सर्दी शुरू हो गई थी। दोस्त अमर सिंह एक विदेशी नस्ल की पिल्ली ले आए। काले रंग की चमकदार। घर वालों ने खूब मना किया पर दिलीप चाचा रोक न सके खुद को। पिल्ली को रख लिया। नाम रखा जूली।

अब गाय की ज़िम्मेदारी छूट गई। जूली की सेवा ही दिलीप चाचा की दिनचर्या बन गई। गाय के बाड़े में ही उसके लिए जगह बनाई गई थी। देखते ही देखते साल भर की होने को आई जूली। भूकती जरूर थी पर आक्रामक न थी। साल भर में जूली किसी पर भी न लपकी थी। मुहल्ले में भी छोटे बड़े सभी जूली से हिलमिल गए थे। कभी- कभी खेल- खेल में पीछे दौड़ जरूर पड़ती थी पर यह उसकी फितरत थी।

दो रात से जूली गाय के बाड़े में अपनी जगह से हिली न थी। खाना बराबर खा रही थी पर उठकर बाहर न आई थी। चाचा को थोड़ा बहुत तजुरबा था। कंपाउंडर शुक्ला जी को बुलवाया। दवाई पिलाई गई। उन्होने ही बताया कि जूली प्रेगनेंट थी। पर दिलीप चाचा थोड़ा हैरान थे। जूली का स्वभाव बदल रहा था। वह उतनी दोस्ताना न रह गई थी। खाना रखते समय दिलीप चाचा को अजीब तरह से घूरती। कभी कभी उनपर गुर्राती।

रात पूरे समय तक अजीब तरह से चिल्लाती रही। सुबह पहला बच्चा बाहर आया। चाचा की खुशी का ठिकाना न रहा। वह अब और इंतज़ार न कर सकते थे। यह पहला मौका था जब पाली हुई कुतिया को बच्चे हो रहे थे। लोगों ने पहले से ही कह रखा था कि जब इसके बच्चे हों तो एक हमें देना। आखिर अलसेशियन नस्ल थी। दूध ब्रेड लेकर दिलीप चाचा दरवाजा खोल बाड़े के भीतर गए। पर यह क्या, जूली अचानक गुर्राते हुये उठी और उसने दिलीप चाचा पर हमला बोल दिया। दिलीप चाचा फौरन उल्टे पाँव वापस भागे। उन्होने बताया कि उसकी आँखों में असामान्य सा गुस्सा और हमलावर तेवर दिखे। बाड़े का दरवाजा लगाकर वहीं खड़े देखते रहे। हम सब भी वहीं इकट्ठे हो चले थे। मैंने देखा जूली मुंह में लेकर अपने बच्चे के पैर चिगल रही थी। बच्चा निर्जीव सा था पर अपने बच्चे के पैर चिगलने वाली बात बहुत अजीब थी। फिर लेटे लेटे ही मरा हुआ बच्चा मुंह से उठाकर किनारे रख दिया। अब देखा दूसरा बच्चा आधा निकल आया था। पर बड़ी ही अजीब सी चीज़ देखने को मिली। जूली खड़ी हुई और पीछे पलटकर आधे निकले बच्चे को दांतों से काटने की कोशिश करने लगी। उसने दूसरा बच्चा भी आधा चिगल डाला था।

देखते ही देखते वहाँ चार अधखाए पिल्लों का ढेर लग गया था। पाँचवाँ बच्चा बाहर आते तक यह खबर पूरे मुहल्ले में फैल गयी। किसी ने सुझाया कि वह जबर्दस्त भूखी है, ब्रेड का पैकेट लेकर बाहर से ही दिखाएँ, जब वह बाहर आए तब तक कोई दूसरी तरफ से बाड़े की दीवार फांदकर भीतर जाए और एक मात्र जिंदा बच्चा उठा लाये।

चाचा ने यह भी आजमाया। वह किसी और को जोखिम में नहीं डालना चाहते थे इसलिए मुझे बाहर से ब्रेड का पैकेट दिखाने की ज़िम्मेदारी दी और खुद भीतर कूदकर बच्चा उठा लाने का फैसला किया। मुझे साफ हिदायत दी कि ब्रेड के लिए जूली के बाहर की तरफ आते ही मैं ब्रेड फैलाकर वहाँ से फौरन दफा हो जाऊँ, खड़ा न रहूँ। मैंने ऐसे ही किया। जूली भूखी थी, ब्रेड देखकर वह बाहर की तरफ आई। दिलीप चाचा इसी ताक में थे। झट कूदकर बाड़े के अंदर पहुंचे। पर जूली को जैसे सब पता था, बिना ब्रेड उठाए बिजली की सी फुर्ती के साथ वह पलटी और तेज़ी से भूकती हुई बाड़े के भीतर भागी। जूली की इस आक्रामकता को चाचा पहचान रहे थे। बिना देर किए वह बाड़ा फांदकर बाहर आ गए।

चाल कामयाब न होने पाई थी। जूली ने पाँचवाँ और फिर छटवा बच्चा भी चिगल डाला था। मुहल्ले भर में तरह तरह की बातें चल रही थीं। लोग इसे भारी अपशकुन बता रहे थे। किसी ने तो यहाँ तक कह डाला कि यह तो डायन के से लक्षण हैं। इन सबसे बेखबर दिलीप चाचा को जूली की चिंता थी। दो दिन बाद जूली थोड़ी सामान्य हुई। बाड़े से बाहर निकली, बाहर रखा ब्रेड और दूध खाया और वहीं बैठ गई। शायद वह कहना चाह रही थी कि अब बाड़े के भीतर कोई भी जा सकता है। दिलीप चाचा ने भारी मन से बाड़े की सफाई की। छः अधखाए पिल्लों के हाड़ माँस को बाहर ही गड्ढा खोदकर गाड़ा। जूली को गरम पानी से नहलाया और चैन से बांधकर बाहर घूमाने ले गए।

सबकुछ एक बुरे सपने की तरह था। जूली अब सामान्य थी। खा रही थी, पी रही थी और खेल कूद रही थी। बाहर घूम रही थी। देखते देखते साल गुज़र गया। गाय ने दो बछड़े दिये थे। सर्दी को देखते हुये गाय को उसके दोनों बछड़ों के साथ बाड़े से अलग एक बंद सार में रखा गया था। बाड़े में अब अकेले जूली का साम्राज्य था। जूली का पेट फिर बड़ा दिखा, उसके स्तन भर आए थे। अगले दिसंबर की जाड़े की रात फिर वही मंज़र दुहराया गया। लोगों ने सलाह दी की किसी तरह एक पिल्ले को बचा के सुरक्षित कर लिया जाए और फिर जूली को जंगल में छोड़ आया जाए। कम से कम अलसेशियन वंश तो बचेगा। पर जूली ने एक भी जिंदा न छोड़ा था। दिलीप चाचा के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था। आमतौर पर उसके व्यवहार को देखते हुये यह कोई न कह सकता था कि वह अपने नवजात पिल्लों को खा जाती होगी।

समय गुजरता रहा। दिलीप चाचा में अब एक और बार ये मंज़र देखने का साहस न था। मुहल्ले वाले भी अपशकुन की बात बार बार दुहरा रहे थे। चाचा पर दबाव था कि इस बार गाभिन होने से पहले ही जूली से किसी भी तरह छुटकारा पा लिया जाए। बच्चे भले ही हाथ न लगे थे पर दिल कड़ा करके जूली को जंगल में छोड़ आने की योजना को उन्होने मंजूरी दे दी। सर्दियाँ फिर आ गई थीं। चाचा देरी नहीं करना चाहते थे। अमर सिंह अपनी बुलेट गाड़ी लेकर आ गए। दिलीप चाचा बोरे में जूली को बंद कर चुके थे। लालपुर के जंगल में भीतर की तरफ मोटर साइकल पहुंची। बोरे की रस्सी ढीली करके चाचा ने बोरे को नीचे उतार दिया। बुलेट बिना देर किए वापस लौट आई। चाचा ने पलट कर भी न देखा था।

घर लौटकर दिलीप चाचा बहुत रोये, और उन्होने फिर कोई कुतिया न पालने की सौगंध खाई।

वक्त बीतता रहा। दिलीप चाचा बीमा एजेंसी के अपने काम में मशगूल हो गए। कुत्ते से सावधान वाला बोर्ड निकालकर फेंक दिया। पाँच महीने बाद घंघरी गाँव से आने वाले दूधवाले ने बताया कि लालपुर के जंगल में एक विदेशी नस्ल की कुतिया ने छः बच्चे दिये थे। गाँव के लोग एक एक पिल्ला उठा ले गए हैं।

लोगों का कहना था कि घोड़े, कबूतर और कुत्ते काफी अरसे बाद भी अपनी पुरानी जगहों पर लौट आते हैं। चाचा को भी मन के किसी कोने में ये आस बनी रही होगी।

पर सालों बाद भी जूली का कुछ पता न चला।

अनिल सिंह

भोपाल 21 नवंबर 2022